कर्म योग क्या होता है? कर्म योग को जानिए गीता के माध्यम से

कर्म योग (Karma Yoga) जिसे भगवद गीता मे सबसे बड़ा योग मानना माना गया है। कर्म योग मतलब कर्म करके किसी वस्तु को प्राप्त करना, ऐसा करने से आप उसे कर्म से भी जुड़े होते है और उस कर्म को करने की शक्ति भी आपको अंदर से मिलती है। हिन्दू धर्म मे कर्म की परिभाषा ये है की कर्म आपके सिर्फ करने मात्र से नहीं साबित होते, कर्म, सोचने, सुनने, किसी से करवाने का भी एक रूप होता है। कर्म आपका कर्तव्य बन जाता है।

कर्म योग
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कर्म योग (Karma Yoga) क्या होता है ?

श्री कृष्ण के अनुसार जब आप किसी के भलाई के लिए जो भी काम करते है वो कर्म योग मे काउन्ट होता है। गीत के अनुसार कर्म के 12 नियम (12 law of karma in Hindi) होते है जिन्हे अपना कर अपने जीवन को एक नई दिशा दिखा सकते है।

अगर किसी भी काम को पूरी इच्छाशक्ति के साथ किया जाए तो वो कर्म नहीं आपका धर्म बन जाता है। ओर वही कर्म योग कहलाता है। कर्म का योग से, और योग से आपका सीधे तौर पर संबंध है, तो योग को कर्म से अलग नहीं किया जा सकता है। जब हम कोई काम अपनी इच्छा से अपनी जिम्मेदारी से करते है तो वह कर्म के योग के अंतर्गत आता है। ओर यह वही रिश्ता है जिसे आप ईश्वर के साथ बनाना चाहते है। आकर्षण के नियम के अनुसार आपका भाग्य, आपके कर्मों पर आधारित है। जैसा कर्म होगा वेसे ही आपके भाग्य का उदय होगा।

कर्म योग से मोक्ष तक

9 -PREREQUISITES-ESSENTIALS FOR SALVATION- मतलब नौ तरीके बताए गए है जो की आपको मोक्ष की तरफ लेकर जाते है उनमे से एक तरीका कर्म योग भी है।

  1. सब पर दया करना
  2. क्षमा करना
  3. प्राणियों की रक्षा करना
  4. ईर्षा द्वेष न करना
  5. आत्मा की पवतित्रता
  6. परिश्रम रहित अथवा अनायास प्राप्त हेतु कार्यों के अवसर पर उन्हें मांगलिक आचार- व्यवहार के द्वारा संपन्न करना
  7. दीन दुखियों की सहायता करना
  8. पराए धन व पराई स्त्री से दूर रहना
  9. कर्म योग

इनमे सभी के सभी बहुत महत्वपूर्ण है मगर जो सबसे ज्यादा जरूरी है वो है कर्म योग। अब पता करते है कर्म योग कैसे करते है।

कर्म योग (Karma Yoga) के बारे मे महत्वपूर्ण जानकारी

गीता मे कहे गए इस श्लोक से हमे बहुत कुछ सीखना चाहिए – माँ फलेषु कदाचान, मतलब फल पर आपका अधिकार नहीं है। फल कर्म पर आधारित है, ओर कर्म आप पर। तो कही न कही आप ही जिम्मेदार है जो भी कुछ हो रहा है या फिर जो भी कुछ होने वाला है।

कर्म की एक खास बात है की उसका फल मिलता तो है, मगर कब मिलता है कोई नहीं जनता। हो सकता है की कल ही मिल जाये और हो सकता है की न मिले। कभी काभी आपने देखा होगा की बहुत मेहनत करने के बाद भी आप सफल नहीं होते है। इसके पीछे क्या कारण हो सकता है? कारण बहुत सारे हो सकते है उनमे से मुख्य कारण awareness होता है, मतलब की आपको पता ही नहीं था की आप ऐसा क्यों कर रहे थे, या फिर आप सिर्फ फल की इच्छा मे ही काम कर रहे थे। और ऐसा करना गलत है, जिस चीज पर आपका अधिकार नहीं है उसे आप कैसे प्राप्त कर सकते है।

कर्म कैसे करे?

कर्म करने सोचने वाले, ओर फल सोचकर कोई काम करने वाले हमेशा ही दुख पाते है।

“हानी लाभ जीवन मरण- जस अपजस विधि हाथ”

मतलब आप सिर्फ काम करिए, और उसे करके भूल जाईए, क्योंकि आप कर्म के विधान को नहीं पलट सकते है, अगर आपने कोशिश भी की तब भी आप कुछ नहीं कर पाएंगे। सिर्फ अपना समय ही खराब कर लेंगे। कर्म फल के कारण मत बनो, कर्म करके जो भी आपको मिला है वो बुरा भी हो सकता है और अच्छा भी हो सकता है, वो भी फल ही होता है, उसे स्वीकार करो।

कर्म योग
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जितने भी काम है वो आप nature की सहायता के बिना नहीं कर सकते, आपको किसी न किसी की सहायता की जरूरत होती है। ओर वही जरूरत आपको helpless बना देती है। तो फिर फल पर आपका अकेले का अधिकार कैसे हो सकता है। वो तो सभी की सहायता से किया गया कार्य था। मतलब आपका फल सिर्फ आपका नहीं है वो उन तमाम चीजों का है जिसे आपने इस्तेमाल किया था।

कर्म करते ववक्त अगर इंसान उसके फायदे या नुकसान देखने लगता है तो उसका उस फल से दूर होना ते स हो जाता है। कर्म इंसानों के लिए बनाए गए थे, जिससे वह हमेशा ही किसी न किसी कार्य मे लिप्त रहे ओर ऐसा करने से वह बुरे कामों से बचा रहता है।

मगर जब इंसान कर्म पर ध्यान न देकर फल के nature को जानना चाहता है तो वह अपने ही जाल मे फसता चला जाता है।

इंसान की इच्छाएं ही कर्म का आधार होती है, ओर उसके आसपास का वातावरण ही निर्धारित करता है की कर्म का आपके जीवन मे क्या सहयोग हो सकता है।

कर्म आपकी पूजा है जिसे करते रहे।

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